भारत देश को अनेकता में एकता वाला देश माना जाता है। यहां अलग-अलग सोच विचार वाले लोग एक दूसरे के साथ मिल जुल कर रहते है और इस साथ का सबसे बड़ा सारथी बनती है भाषा। यदि भाषा नहीं हो तो एक दूसरे से वार्तालाप करने का कोई साधन ही नहीं होगा।
वैसे तो भारत में 13 ऐसी भाषाएं जिन्हें वैधानिक माना गया है, लेकिन यहां लगभग 21 भाषाएं बोली जाती है और बोलियों का तो हिसाब ही नहीं है। माना गया है कि हर 40 किलोमीटर की दूरी पर बोली बदल जाती है। यहां तक कि भारत में भाषा के मामले में भी राज्य अपनी-अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। भारत के नक्शे में उत्तर में स्थित जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी बोली जाती है तो दक्षिण के तमिलनाडु में तमिल बोली जाती है। वहीं बात यदि भारत का हृदय माने जाने वाले राज्य मध्यप्रदेश की जाए तो यहां कई भाषाओं का संगम देखने मिलता है। मध्यप्रदेश के लिए तो यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यहां हिन्दी बसती है। भारत में अधिकांश राज्य ऐसे है जिनकी अपनी अलग भाषा है जैसे गुजरात में गुजराती तो बंगाल में बंगाली, लेकिन मध्यप्रदेश एक मात्र ऐसा राज्य है जहां हिन्दी की जडे़ आज भी मजबूत है। आधुनिकता ने भाषा को तोड़-मड़ोड जरूर दिया है परन्तु उसका अस्तीत्व आज भी कायम है। मध्यप्रदेश में हिन्दी भाषा के जुड कर ही अन्य बोलियों बोली जाती है जिसे हम सामान्य तौर पर अभं्रश हिन्दी भी कहा सकते है। कुल मिलाकर उनकी जनक तो हिन्दी ही है, चाहे बात मालवा में बोले जाने वाली मालवी है या बुंदेलखंड में बोले जाने वाली बुंदेलखंडी या फिर निमाड़ में बोले जाने वाली निमाड़ी।
हिन्दी भारत की राष्ट्रीय भाषा है लेकिन मूल रूप में इस मध्यप्रदेश में ही देखा जा सकता है। यहां तक कई बार हिन्दी भाषा पर होने वाली प्रतियोगिता में विजेता मध्यप्रदेश से ही होते है। उसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यहां लोगों ने हिन्दी के अस्तीत्व को कभी खत्म नहीं होने दिया। कई राज्य ऐसे है जहां हिन्दी बोलने में लोगों को हिचक होती है क्योंकि वह राष्ट्र भाषा से ज्यादा महत्व अपनी मात्र भाषा को देते है। लेकिन मध्यप्रदेश वास्तव में भारत की एकता को बनाए हुए है और एक मात्र ऐसा राज्य है जहां सभी 13 भाषाओं को बोलने वाले लोग रहते है लेकिन कभी हिन्दी के अस्तीत्व को खत्म नहीं होने दिया। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत के ह्रदय प्रदेश मध्यप्रदेश में बसती है हिंदी।
– हीना तिवारी

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