मध्य प्रदेश के ग्वालियर हाईकोर्ट बेंच ने अदालती मामलों में सरकारी तंत्र की सुस्ती और लापरवाह रवैये पर बेहद कड़ी नाराजगी जाहिर की है। एक केस की अपील दायर करने में 329 दिन (11 महीने) की भारी-भरकम देरी पाए जाने पर अदालत ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) पर 3 लाख रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना ठोक दिया है। कोर्ट ने यह सजा अधिकारी पर व्यक्तिगत रूप से लगाते हुए स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि उन्हें यह रकम अपनी जेब से 7 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री में जमा करनी होगी। इसके अलावा, राज्य के प्रमुख सचिव को यह निर्देश दिए गए हैं कि इस मामले में दोषी और लापरवाह ओआईसी (OIC) तथा अन्य अधिकारियों के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई की जाए।
📋 क्या है पूरा मामला? स्व. राजेंद्र सिंह परमार के वारिसों से जुड़ा है विवाद
मामले की पृष्ठभूमि:
- शासन की याचिका: यह पूरा मामला स्व. राजेंद्र सिंह परमार के कानूनी वारिसों के खिलाफ मध्य प्रदेश शासन द्वारा लगाई गई एक याचिका से जुड़ा हुआ है।
- अपील में देरी: शासन ने राजेंद्र सिंह परमार के कानूनी वारिस मुन्नी देवी व अन्य के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील पेश करने में 329 दिनों की लंबी देरी कर दी। जब इस देरी पर सुनवाई शुरू हुई, तो अदालत ने सरकारी अफसरों के इस रवैये को सामान्य लापरवाही मानने से साफ इनकार कर दिया और इसे जानबूझकर की गई देरी करार दिया।
👨⚖️ युगल पीठ की तीखी टिप्पणी; संतोषजनक जवाब न दे पाने पर कोर्ट ने की सख्त कार्रवाई
अन्यायालय की कार्यवाही और निर्देश:
- अस्पष्ट आवेदन पर नाराजगी: उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की युगल पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान ग्वालियर के सीएमएचओ बतौर ऑफिसर इन चार्ज (OIC) पेश हुए थे। इतनी लंबी देरी के बावजूद वे अदालत में कोई भी संतोषजनक कारण नहीं बता सके और एक बेहद सामान्य व अस्पष्ट आवेदन पेश किया।
- व्यक्तिगत जुर्माना: अफसरों के इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये को देखते हुए अदालत ने उन पर 3 लाख रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना लगा दिया और इसे सात दिन के भीतर जमा करने का हुक्म सुनाया।
⚠️ शासन को कड़ी चेतावनी; भविष्य में पुनरावृत्ति पर कलेक्टर होंगे जिम्मेदार
कोर्ट की चेतावनी और निर्देश:
- सुस्त रवैये पर फटकार: सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के बार-बार सख्त निर्देशों के बावजूद सरकारी अधिकारी अदालती मामलों में बेहद गैर-संवेदनशील बने हुए हैं।
- भविष्य की चेतावनी: अदालत ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में इस प्रकार का लापरवाही भरा मामला दोबारा सामने आया, तो इसके लिए सीधे तौर पर जिले के कलेक्टर और संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदार माना जाएगा।

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