November 3, 2026

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Historian Govind Devliya Interview: गुर्जर-प्रतिहार और परमार काल का बेजोड़ नमूना है माला देवी मंदिर, एएसआई की चुनौतीपूर्ण मुहिम शुरू

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले की ग्यारसपुर तहसील में स्थित लगभग 1100 वर्ष पुराना ऐतिहासिक माला देवी मंदिर (Mala Devi Temple) एक बार फिर राष्ट्रीय सुर्खियों में है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा इस प्राचीन रॉक-कट जैन मंदिर को सुरक्षित रखने और ढहने से बचाने के लिए इसे पत्थरों से डिस्मेंटल कर नए सिरे से पुनर्निर्मित करने की एक वृहद व चुनौतीपूर्ण योजना पर काम शुरू कर दिया गया है। इस पूरी पुरातात्विक प्रक्रिया और मंदिर के गौरवशाली इतिहास को लेकर विदिशा के जाने-माने इतिहासकार और संस्कृतिकर्मी गोविंद देवलिया ने कई महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक जानकारियां साझा की हैं।

🛕 9वीं-10वीं शताब्दी का है यह मंदिर; जैन और हिंदू संस्कृति के अनूठे समन्वय का प्रतीक

वास्तुकला और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

  • प्रतिहार कालीन निर्माण: इतिहासकार गोविंद देवलिया ने बताया कि गुर्जर-प्रतिहार शासन काल (लगभग 9वीं से 10वीं शताब्दी) के दौरान इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया था।
  • सांस्कृतिक सौहार्द: यह मंदिर जैन और हिंदू संस्कृति के अद्भुत समन्वय का नायाब उदाहरण है। इसके गर्भगृह की बनावट और मूर्तियों से यह स्पष्ट रूप से एक जैन मंदिर प्रतीत होता है, वहीं मंदिर के बाहरी प्रवेश द्वारों पर उकेरी गई हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमाएं उस दौर के धार्मिक सौहार्द को दर्शाती हैं।
👑 माला देवी नाम पड़ने की कहानी और परमार वंश से राजा माधव देव का कनेक्शन

नामकरण और राजा भोज का काल:

  • इतिहासकार का संदर्भ: इतिहासकार निरंजन वर्मा की पुस्तक का हवाला देते हुए गोविंद देवलिया ने बताया कि परमार वंश में राजा माधव देव हुए थे, जो महान राजा भोज के भतीजे थे।
  • अपभ्रंश रूप: अनुमान है कि मंदिर निर्माण की शुरुआत प्रतिहार वंश के दौरान हुई थी, लेकिन इसे पूर्णता परमार राजा माधव देव के शासनकाल में मिली। राजा माधव देव के नाम से समय के साथ उच्चारण बदलते-बदले यह अपभ्रंश होकर ‘माला देवी’ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
⛰️ पहाड़ी को काटकर बनाई गई अद्भुत रॉक-कट कारीगरी; सिंधिया काल में भी हुआ था संरक्षण

स्थापत्य कला और प्राचीन तकनीक:

  • रॉक-कट शैली: यह मंदिर वास्तुकला की दुर्लभ रॉक-कट (पहाड़ी को तराशकर बनाने की) शैली में निर्मित है। इसका आधा हिस्सा पहाड़ी चट्टान को काटकर तैयार किया गया है, जबकि ऊपरी छत, गर्भगृह और पिछला भाग प्राकृतिक पहाड़ी का ही अभिन्न अंग है।
  • इंटरलॉकिंग तकनीक: पत्थरों को बिना चूने या सीमेंट के एक-दूसरे के खांचों (Interlocking System) में फिट करने की प्राचीन तकनीक से इसे अभूतपूर्व मजबूती दी गई थी।
  • ग्वालियर स्टेट का योगदान: 1920-30 के दशक में ग्वालियर स्टेट (सिंधिया राजवंश) के तत्कालीन महानिदेशक पुरातत्व एम.बी. गर्दे ने विदिशा जिले के कई स्मारकों का संरक्षण कराया था, जिसमें इस मंदिर की देखभाल के ऐतिहासिक दस्तावेज मिलते हैं।
🏗️ एएसआई का चुनौतीपूर्ण निर्णय; हर एक पत्थर की हो रही है डिजिटल कोडिंग और रिकॉर्डिंग

वर्तमान स्थिति और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया:

  • दूरी और स्थान: विदिशा से ग्यारसपुर की दूरी लगभग 37 किलोमीटर है और वहां से लगभग 1.5 किलोमीटर की ऊंची पहाड़ी चढ़कर मंदिर तक पहुंचना पड़ता है।
  • कमजोर आधार: एएसआई की तकनीकी जांच में सामने आया कि मंदिर का मूल आधार समय के साथ काफी कमजोर और भुरभुरा हो चुका है, जिससे इसके क्षतिग्रस्त होने का खतरा बढ़ गया था।
  • डॉक्यूमेंटेशन कार्य: मंदिर को बचाने के लिए एएसआई ने प्रत्येक पत्थर और नक्काशीदार हिस्सों की मैन्युअली व डिजिटली नंबरिंग, कोडिंग और डॉक्यूमेंटेशन का काम शुरू कर दिया है। मंदिर के नीचे एक नया और मजबूत प्लेटफॉर्म तैयार कर इसे हूबहू पुनस्थापित किया जाएगा।
  • इतिहासकार की राय: इतिहासकार गोविंद देवलिया का मानना है कि पिछले 50 वर्षों से उन्होंने मंदिर को सुरक्षित देखा है, लेकिन एएसआई का यह कदम वास्तुकला की इस अमूल्य धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा।
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