पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम सभा को सबसे बुनियादी, शक्तिशाली और महत्वपूर्ण इकाई माना जाता है, जहाँ सभी मतदाता और जनप्रतिनिधि मिलकर गांव के विकास की रूपरेखा तैयार करते हैं। हालांकि, हाल ही में रतलाम जिले से सामने आए मामलों ने इस व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि ग्राम सभाओं की मूल शक्तियां धीरे-धीरे कम हो रही हैं और ये केवल एक रस्मअदायगी बनकर रह गई हैं, जहाँ स्थानीय मुद्दों पर चर्चा के बजाय सरकार के तयशुदा एजेंडे थोपे जा रहे हैं।
📝 साल में 4 बैठकों का है प्रावधान: 2 अक्टूबर को आयोजित ग्राम सभाओं में पहले से तय एजेंडा पास कराने पर उठे सवाल
संविधान के अनुच्छेद 243A के तहत ग्राम सभा का प्रावधान है और पंचायती राज अधिनियम के अनुसार साल में कम से कम 4 बैठकें होना अनिवार्य है। इन बैठकों का उद्देश्य गांव के विकास कार्यों, बजट और योजनाओं की समीक्षा करना होता है। लेकिन बीते 2 अक्टूबर को आयोजित ग्राम सभाओं के दौरान केंद्र और राज्य सरकार द्वारा वीबीजीरामजी योजना को लेकर पहले से ही तय किए गए एजेंडे को जबरन पास करवाए जाने की बात सामने आने के बाद जनप्रतिनिधियों में नाराजगी देखने को मिली है।
🗣️ युवा सरपंच और जिला पंचायत सदस्य ने जताया विरोध: सीईओ वैशाली जैन ने दी सफाई
करमदी गांव की युवा सरपंच निष्ठा राजपुरोहित और जिला पंचायत सदस्य डीपी धाकड़ ने खुलकर आरोप लगाया है कि पिछले चार सालों में ग्राम सभा में लिए गए प्रस्तावों पर शासन स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती और जनप्रतिनिधियों के वित्तीय अधिकार भी सीमित कर दिए गए हैं। वहीं, इस पूरे मामले पर रतलाम जिला पंचायत की सीईओ वैशाली जैन ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि ग्राम सभाओं में मिलने वाले प्रस्तावों का मूल्यांकन कर नियमानुसार प्रशासनिक स्वीकृति दी जाती है और नियमों के तहत ही सभी गतिविधियां संचालित होती हैं।

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