September 28, 2026

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Kaag Udyan Vidisha: मोबाइल टॉवर और प्रदूषण से गायब हो रहे कौवे, मुक्तिधाम सेवा समिति पिछले 15 साल से बचा रही है पक्षी प्रजाति

सनातन धर्म और हिंदू परंपरा में पितृपक्ष का विशेष और पवित्र महत्व माना गया है। ऐसी गहरी मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान कौवों के माध्यम से निकाला गया भोजन सीधे हमारे पूर्वजों (पितरों) तक पहुंचता है। लेकिन वर्तमान समय में बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण और मोबाइल टॉवर के खतरनाक रेडिएशन के कारण शहरों से कौवे धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं। इस वजह से पितृपक्ष के इन खास दिनों में लोग कौवों के दर्शन और उनकी तलाश में भटकने को मजबूर होते हैं। इसी गंभीर समस्या को भांपते हुए मध्य प्रदेश के विदिशा की ‘मुक्तिधाम सेवा समिति’ ने एक बेहद अनूठी और प्रेरणादायक मिसाल कायम की है। समिति द्वारा यहां के मुक्तिधाम परिसर में पिछले 15 वर्षों से लगातार ‘काग उद्यान’ का सफल संचालन किया जा रहा है, जहां न केवल पितृपक्ष के दौरान बल्कि पूरे साल के 365 दिन पक्षियों के लिए भरपेट आहार और शुद्ध जल की पुख्ता व्यवस्था की जाती है।

🍲 विलुप्त होती पक्षी प्रजाति को सहेजने का अनूठा प्रयास: काग रसोई में तैयार होते हैं स्वादिष्ट व्यंजन

मुक्तिधाम सेवा समिति के सचिव मनोज पांडे इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहते हैं, “पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ तेजी से विलुप्त हो रही काग (कौवा) प्रजाति को सुरक्षित सहेजने के उद्देश्य से ही इस विशेष काग उद्यान का निर्माण कराया गया था।” उन्होंने बताया कि यहां पक्षियों के लिए बाकायदा एक समर्पित ‘काग रसोई’ संचालित की जाती है, जहां हर रोज सुबह पोहा, चावल और अन्य पौष्टिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा शहरभर की प्रतिष्ठित मिष्ठान और नाश्ते की दुकानों से समोसे, कचौरी, भजिया, ब्रेड, बड़ा और जलेबी जैसी खाद्य सामग्रियां भी एकत्र करके प्रतिदिन यहां लाई जाती हैं। मनोज पांडे ने आगे बताया कि परिसर में पक्षियों के लिए विशेष भोजन थाल और पीने के लिए पानी के पात्र स्थापित किए गए हैं। नियमित देखरेख और दोस्ताना माहौल मिलने के कारण अब यहां के कौवे इंसानों से डरते नहीं हैं, बल्कि बेझिझक पास आकर अपना आहार ग्रहण करते हैं।

🔬 धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण हैं कौवे: पर्यावरण के प्राकृतिक सफाईकर्मी

धार्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो कौवे हमारे दिवंगतों और पुरखों के प्रत्यक्ष प्रतीक माने जाते हैं, और पितृपक्ष में इन्हें भोजन कराने से यह संतुष्टि मिलती है कि आहार सीधे पितरों तक पहुंच गया है। वहीं दूसरी ओर, वैज्ञानिक नजरिए से भी कौवे पर्यावरण के सबसे बड़े और प्राकृतिक सफाईकर्मी (Natural Scavengers) होते हैं, जो मानव शरीर के लिए बेहद हानिकारक विषैले जीव-जंतुओं और कचरे का भक्षण कर पर्यावरण का संतुलन बनाए रखते हैं। उल्लेखनीय है कि रमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात पर्यावरणविद् डॉ. राजेंद्र सिंह ने भी इस अनूठे काग उद्यान का लोकार्पण करते हुए इसे देश का एक अत्यंत अद्वितीय प्रयास बताया था।

🕊️ पितृपक्ष में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़: तर्पण करने वालों को मिल रही है बड़ी राहत

श्री चरण तीर्थ धाम के मुख्य पुजारी एवं मध्य प्रदेश प्रांतीय पुजारी महासभा के अध्यक्ष पंडित संजय पुरोहित ने जानकारी देते हुए बताया, “जब सूर्यदेव कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, तब पितर लोक से मृत्युलोक में आते हैं। सनातन परंपरा के अनुसार उनके निमित्त तर्पण और पंचबली यानी गाय, कुत्ते, कौवे, अतिथि तथा कीट-पतंगों को भोजन दान करने का बड़ा विधान है।” उन्होंने कहा कि मुक्तिधाम का यह काग उद्यान वाकई एक श्रेष्ठ कार्य कर रहा है, जहां साल के हर दिन कौवों को भोजन कराया जाता है। पितृपक्ष के इन दिनों में प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु और यजमान यहां आकर अपने पितरों की शांति व तृप्ति के लिए कौवों को भोजन-प्रसादी वितरित करते हैं। तर्पण करने पहुंचे स्थानीय नागरिक अनिल चौरसिया ने भी अपनी बात रखते हुए कहा कि आज के दौर में शहरों में आसानी से कौवे दिखाई नहीं देते, लेकिन मुक्तिधाम स्थित इस काग उद्यान में वर्षभर पुख्ता व्यवस्था रहने से श्रद्धालुओं को अपने पूर्वजों के नाम से भोग लगाने में बहुत आसानी होती है। ऐतिहासिक महत्व वाले इसी श्री चरण तीर्थ धाम पर पूर्व में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की अस्थियों का विसर्जन भी किया गया था, और आज यह काग उद्यान धार्मिक आस्था के साथ-साथ पक्षी संरक्षण का भी एक बड़ा केंद्र बन चुका है।

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