मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में जन्माष्टमी का पर्व बेहद अनूठे और अलग अंदाज में मनाया जाता है। यहाँ बाघों के साम्राज्य के बीच घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों की चोटी पर स्थित सैकड़ों साल पुराने ऐतिहासिक श्रीराम-जानकी मंदिर में भगवान श्रीराम को ‘कान्हा’ और माता सीता को ‘राधा रानी’ के रूप में पूजने की अद्भुत परंपरा चली आ रही है। ताला गांव से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित इस प्राचीन किले (बंधवाधीश मंदिर) के कपाट आम दिनों में श्रद्धालुओं के लिए पूरी तरह बंद रहते हैं, और साल में केवल एक बार कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर ही इसे खोला जाता है, जिस दौरान यहाँ विशेष पूजा-अर्चना के साथ एक भव्य मेले का भी आयोजन होता है।
👑 महाराजा मार्तंड सिंह की शर्त के कारण आज भी जीवंत है परंपरा, भगवान राम ने लक्ष्मण को गिफ्ट किया था यह किला
वन्यजीव संरक्षण के कड़े नियमों और सामान्य दिनों में प्रतिबंधित क्षेत्र होने के बावजूद इस प्राचीन धार्मिक परंपरा का विशेष महत्व है। 1970 के दशक में बांधवगढ़ क्षेत्र को टाइगर रिजर्व घोषित किए जाने के बाद से जंगल में लोगों के स्वतंत्र आवागमन पर रोक लगा दी गई थी, लेकिन राजा महाराजाओं के समय की इस आस्था को कायम रखने के लिए तत्कालीन महाराजा मार्तंड सिंह ने मध्य प्रदेश शासन के सामने एक शर्त रखी थी कि किले में लगने वाला पारंपरिक मेला और धार्मिक आयोजन कभी बंद नहीं किया जाएगा। इसी शर्त और परंपरा के चलते हर साल जन्माष्टमी पर श्रद्धालुओं को किले के भीतर स्थित मंदिर तक जाने की विशेष अनुमति मिलती है। इसके अलावा, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम ने वनवास से लौटने के बाद यह किला अपने भाई लक्ष्मण को उपहार में दिया था, जिसके चलते इसका नाम ‘बांधवगढ़’ (भाई का किला) पड़ा।
🛡️ बांधवगढ़ रिजर्व प्रबंधन ने जारी की कड़ी गाइडलाइन: 135 कर्मचारी तैनात, 12 साल से कम उम्र के बच्चों और बुजुर्गों के प्रवेश पर रोक
जन्माष्टमी के दिन जब इस रहस्यमयी और शांत जंगल के कपाट खुलते हैं, तो पूरा इलाका श्रद्धालुओं की मौजूदगी से गूंज उठता है। सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने के लिए बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्रीय संचालक अनुपम सहाय ने बताया कि मेले के दौरान बीटीआर (BTR) के लगभग 135 अधिकारी-कर्मचारी और श्रमिक तैनात रहेंगे। इसके लिए 29 प्रमुख ड्यूटी पॉइंट बनाए गए हैं, किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए संवेदनशील स्थानों पर 6 जिप्सी वाहन तैनात किए गए हैं और हाथियों के जरिए भी जंगल में गश्त की जाएगी। ताला गेट से ही श्रद्धालुओं को प्रवेश दिया जाएगा, जहाँ प्रवेश पत्रों की जाँच होगी। सुरक्षा और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों और 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों को पहाड़ी मंदिर क्षेत्र में जाने की अनुमति नहीं दी गई है।

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