मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं के बड़े-बड़े दावों के बावजूद जमीनी हकीकत बेहद दर्दनाक बनी हुई है। स्वास्थ्य विभाग आंकड़ों को कागजों में हरा-भरा दिखाने में जुटा है, जबकि जमीनी सच्चाई इससे कोसों दूर है। कुछ समय पहले छिंदवाड़ा, पांढुर्णा और बैतूल में विषाक्त कफ सीरप से 25 बच्चों की मौत के बाद पूरे देश में किरकिरी हुई थी, लेकिन इस बड़ी घटना से भी स्वास्थ्य महकमे ने कोई सबक नहीं लिया। ग्रामीण अंचलों में डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी का खामियाजा अब एक बार फिर मासूम बच्चों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ रहा है।
🦟 मलेरिया और खसरा बना काल: एक महीने के भीतर 25 मासूमों ने توड़ा दम
आदिवासी बहुल बालाघाट जिला हमेशा से मलेरिया के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। अब एक बार फिर मलेरिया और मीजेल्स (खसरा) ने मिलकर बच्चों के लिए काल का रूप ले लिया है। राष्ट्रीय वेक्टर बार्न रोग नियंत्रण कार्यक्रम के पुराने आंकड़े भले ही पिछले कुछ वर्षों में मलेरिया से मौत न होने का दावा करते हों, लेकिन बालाघाट के बैहर और बिरसा ब्लॉक में महज एक महीने के भीतर खसरा, मलेरिया और कुपोषण के कारण 25 बच्चों की मौत ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सबसे हैरानी की बात यह है कि दोनों ब्लॉकों में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) होने के बावजूद स्थानीय स्वास्थ्य टीमें 15 दिनों तक यह तक नहीं समझ पाईं कि यह कौन सी बीमारी है, और जब मामला मीडिया की सुर्खियों में आया तब भोपाल से विशेषज्ञों की टीम रवाना हुई।
💰 23 हजार करोड़ का स्वास्थ्य बजट और डॉक्टरों की भारी कमी
प्रदेश में स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट 23 हजार करोड़ रुपये होने के बावजूद धरातल पर स्थिति बेहद चिंताजनक है। अस्पतालों की इमारतें और मशीनें तो तैयार कर दी गई हैं, लेकिन मरीजों की जांच और इलाज करने के लिए 50 प्रतिशत भी डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ उपलब्ध नहीं हैं। पिछले साल दिसंबर में माओवादियों का सफाया होने के बाद उन संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष स्वास्थ्य शिविर लगाकर टीकाकरण अभियान चलाया जाना चाहिए था, जो नहीं किया गया। हालांकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बालाघाट में खसरारोधी टीकाकरण का कवरेज 93 प्रतिशत बताया जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर फैली बीमारियां दावों की पोल खोल रही हैं।
🗣️ सरकार आंकड़े छुपा रही है: पूर्व विधायक किशोर समरीते का बड़ा आरोप
बालाघाट के लांजी से पूर्व विधायक रहे किशोर समरीते ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि जिले में खसरा, मलेरिया, पीलिया और दूषित पेयजल के कारण केवल 25 नहीं, बल्कि पिछले छह महीनों में आदिवासी अंचलों में 110 से अधिक बच्चों की मौत हुई है। उनका दावा है कि सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए मौतों के आंकड़े छुपा रही है और दोषी अधिकारियों को संरक्षण दे रही है। इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा जनजातियों (भारिया, कोरबा और बैगा) के विकास और संरक्षण के लिए भेजे गए 2500 करोड़ रुपये के उपयोग पर भी उन्होंने पारदर्शिता की मांग की है। जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते घर-घर जाकर फीवर सर्वे और विशेष टीकाकरण अभियान चलाया जाता, तो इन मासूमों की जान बचाई जा सकती थी।

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