Women’s Day… जीवन सुगम बना जाती है…

एक छोर को थामे
आगे बढ़ती जाती है
नन्हें-नन्हें कदमों पर
जमकर वो इठलाती है
एक प्यारी सी मुस्कान से
सबका मन मोह ले जाती है
सुनहरी बिटिया मेरी प्यारी
जीवन सुगम बना जाती है।

माँग तुम्हारी भरी रहती
पर सिंदूर में मेरा नाम है
रोटी पकाती जिन हाथों से
उनकी चूड़ियाँ में तुम्हारा प्यार है
मेरे हर अच्छे.बुरे को
मुझसे पहले समझ जाती है।
खुद सूखी रोटी खाकर भी
मुझको पकवान खिलाती है।
मेरा ही नही, पूरे परिवार का
ख़्याल ये अकेले ही रख पाती है।
सुबह के चाय के प्याले से
हर नींद तक साथ निभाती है
मेरी प्यारी धर्मपत्नी
जीवन सुगम बना जाती है।

लड़ती है मुझसे ये खूब
बन्दर मुझे बुलाती है
सत्तू के नाम पर ये
बेसन का घोल पिलाती है
हर राखी के त्यौहार पर
ये माँग इतनी कर जाती है।
फिर बाबा की डाँट से
मुझको बचा ले जाती है।
बिदाई का इसकी ख़्याल आते है
मेरी रूह कांप जाती है।
मेरी प्यारी दुलारी बहना
जीवन सुगम बना जाती है।

इतने दर्द के बाद भी
सन्तान को हँसते हुए जन्म देती है
आँचल में जिसके
अमृत की धारा बहती है
ईश्वर का धरती पर अवतार कहलाती है
ऐसा चमत्कार एक माँ ही कर पाती है।
पल-पल खुद मरते हुए
मुझे जीवनदान दे जाती है।
मेरी माँ हर कष्ट के बीच मुझें
मजबूत होना सिखाती है।
देवी भी जिस समय माँ का दर्जा पाती है
सृष्टि सारी उनके समक्ष संतान सी हो जाती है।
एक माँ तो हर रूप में
जीवन को सुगम बनाती है

कविता का मकसद एक स्त्री के जीवन के चार महत्वपूर्ण पक्षों को सकारात्मक रूप से सामने रखना था। एक महिला इन सबसे ज्यादा होती है। उसे सम्मान दें। उसकी इच्छाओं का मान रखें और उसे बराबरी का हक़दार समझें।

निधि मिश्रा


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